श्राद्ध करना एक अंध विश्वास और पाखण्ड वाद है जाने
श्राद्ध करना एक अंध विश्वास और पाखण्ड वाद है जा रहा है ...........
दोस्तों वर्तमान में सबलेट हैं सब पढ़े लिखे लोग हैं फिर भी हम हमारे रीति रिवाजों के चक्कर में फंसे हुए हैं हमें सच्चाई से बहुत दूर रखा गया है पुराने समय में लोग गरीब और अनपढ़ होते थे जिन्हें वह ना तो शास्त्रों को पढ़ाते थे- ना उन्हें। कितना अधिकार था हमारे धर्म गुरु हमें अंध विश्वास मे डूबे रखते थे जबकि हमारे शास्त्रों में श्राद्ध करना बिल्कुल मना कर रखा है और जो शास्त्र विरूद्व साधना करते हैं उसे ना मोक्ष मिलता है ना परम गति |
दोस्तों सबसे काश बात में आपको बता दूँ कि जो इंसान जिवित होते हुए कुछ ना कर सके तो मरने के बाद क्या करेगा और जब वह जिवित था तब उसने सत्य भक्ति, साधना नहीं करी तो मरने के बाद हमारे द्वारा एक श्राद्ध करने के साथ उसका मोक्ष। हो सकता है इसलिए दोस्तों अगर कुछ करना ही है तो जिवित सत्य भक्ति करते हैं ताकि हमे श्राद्ध करने की ही बात ही नहीं हैं | और हमारे पूर्वजों के लिए श्राद्ध करने से अच्छे हैं उनके जिवित होते हुए उनकी सेवा करें ताकि उनकी आत्मा संतुष्ट हो जाए और उनका मन सत्य भक्ति करने में लगे और उनका पुर्ण मोक्ष हो सके |
कबीर साहेब जी कहते हैं कि -
जिवित बाप के तो लट्ठम - लट्ठ, मुये गंग पुच्चय य |
जब आवेशाज का महीना, का बाप बन गया ||
रे बोलीं सी दुनिया, सतगुरु बिन केसे सरिया |||
दोस्तों सबसे काश बात हमारे पवित्र कर्मग्रन्थों में भी श्राद्ध करना व्यर्थ ने बताया है ..............।
जो समानको पूजता हैं वह वही को प्राप्त होता है इसलिए पितरों को ना पूजे बल्कि हमारे पवित्र शास्त्रों के अनुसार सत्य साधना करे |
जानते हैं कि हमारे शास्त्रों में क्या प्रमाण है ......................
श्राद्ध अर्क (पितर पूजने) वाले पितर बनेंगे, मुक्ति नहीं
गीता अध्याय 9 के श्लोक 25 में कहा गया है कि भगवान को पूजने वाले भगवान को प्राप्त होते हैं, पितरों को पूजने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं, भूतों को पूजने (पिंड दान करने) वाले भूतों को प्राप्त होते हैं अर्थात् भूत बन जाते हैं। शास्त्रानुकुल (पवित्र वेदों व गीता अनुसार) पूजा करने वाले मुझको ही प्राप्त होते हैं अर्थात् काल द्वारा निर्मित स्वर्ग व महास्वर्ग आदि में कुछ ज्यादा समय मौज कर लेते हैं।
विशेष: - जैसे कोई तहसीलदार की नौकरी (सेवा-पूजा) करता है तो वह तहसीलदार नहीं बन सकता है। हाँ उससे प्राप्त धन से रोजी-रोटी चलती हुई अर्थात् उसके पास ही रहेगी। ठीक इसी प्रकार जो जो देव (श्री ब्रह्मा देव, श्री विष्णु देव और श्री शिव देव अर्थात् त्रिदेव) की पूजा (नौकरी) करता है तो उन्हीं से मिलने वाला लाभ ही प्राप्त करता है। त्रिगुणमई माया अर्थात् तीनों गुण (रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमुगन शिव जी) की पूजा का निषेध पवित्र गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 15 और 20 से 23 तक भी है। इसी प्रकार कोई पितरों की पूजा (नौकरी-सेवा) करता है तो पितरों के पास छोटे पितर बन कर उन्हीं के पास कष्ट उठा लेंगे। इसी प्रकार कोई भूतों (भविष्यवाणियों) की पूजा (सेवा) करता है तो भूत बनेगा क्योंकि सारा जीवन जिसमें शेक्तता बनी हुई है अंतर में उन्हीं में मन फंसा रहता है। जिस कारण से उन्हीं के पास चला जाता है। कुछेक का कहना है कि पितर-भूत-देव पूजाऐं भी करते रहेंगे, आप से उपदेश के बारे में साधना भी रहेगी। ऐसा नहीं है। जो साधना पवित्र गीता जी में व पवित्र चारों वेदों में मना है वह कर शास्त्र विरुद्ध हुआ है। जिसको पवित्र गीता अध्याय 16 श्लोक 23-24 में मनाया गया है कि जो शास्त्र विधि त्याग कर मनमाना आचरण (पूजा) करते हैं वे न तो खुशी को प्राप्त करते हैं न परमगति को और न ही कोई कार्य सिद्ध करने वाली सिद्धि को ही प्राप्त करते हैं। अर्थात् जीवन व्यर्थ कर जाते हैं। इसलिए अर्जुन तेरे लिए कर्म (जो साधना के कर्म करने योग्य हैं) और अकर्तव्य (जो साधना के कर्म नहीं करने योग्य हैं) की व्यवस्था (नियम में) में शास्त्र ही प्रमाण हैं। अन्य साधना वर्जित हैं। न ही कोई कार्य सिद्ध करने वाली सिद्धि को ही प्राप्त करते हैं अर्थात् जीवन व्यर्थ कर जाते हैं। इसलिए अर्जुन तेरे लिए कर्म (जो साधना के कर्म करने योग्य हैं) और अकर्तव्य (जो साधना के कर्म नहीं करने योग्य हैं) की व्यवस्था (नियम में) में शास्त्र ही प्रमाण हैं। अन्य साधना वर्जित हैं। न ही कोई कार्य सिद्ध करने वाली सिद्धि को ही प्राप्त करते हैं अर्थात् जीवन व्यर्थ कर जाते हैं। इसलिए अर्जुन तेरे लिए कर्म (जो साधना के कर्म करने योग्य हैं) और अकर्तव्य (जो साधना के कर्म नहीं करने योग्य हैं) की व्यवस्था (नियम में) में शास्त्र ही प्रमाण हैं। अन्य साधना वर्जित हैं।
इसी का प्रमाण मार्कण्डे पुराण (गीता प्रैस गोरखपुर से प्रकाशित पृष्ठ 237 पर है, जिसमें मार्कण्डे पुराण और ब्रह्म पुराणांक इक्ट्ठा ही जिल्द किया गया है) में भी है कि एक रूची नाम का साधक ब्रह्मचारी रह कर वेदों के अनुसार सदना कर रहे थे। जब वह 40 (चालीस) वर्ष का हुआ तब उस को अपने चार पूर्वज जो शास्त्र विरुद्ध साधना करके पितर बने हुए थे और तिल भोग रहे थे, दिखाई दिए। “पितरों ने कहा कि बेटा रूची शादी करवा कर हमारे श्राद्ध निकाल, हम तो दुःखी हो रहे हैं। रूची ऋषि ने कहा पित्रमहो वेद में कर्म काण्ड मार्ग (श्राद्ध, पिंड भरवाना आदि) को मूर्खों की साधना कहा है। फिर तुम मुझे क्यों गलत (शास्त्र विधि रहित) साधना पर लगा रहे हो। पितर बोले बेटा यह बात तो तेरी सत है कि वेद में पितर पूजा, भूत पूजा, देवी-देवताओं की पूजा (कर्म काण्ड) को अविद्या ही कहा है इसमें तनिक भी मिथ्या नहीं है। ” इसी उपरोक्त मार्कण्डे पुराण में इसी लेख में पितरों ने कहा कि फिर पितर कुछ तो लाभ देते हैं।
विशेष: - यह अपनी अटकलें पितरों ने लगाई है, उसने हमने पालन नहीं करना, क्योंकि पुराणों में आदेश किसी ऋषि विशेष का है जो पितर पूजने, भूत या अन्य देव पूजने को कहा है। लेकिन वेदों में प्रमाण न होने के कारण प्रभु का आदेश नहीं है। इसलिए किसी संत या ऋषि के कहने से प्रभु की आज्ञा का उल्लंघन करने से दंड के दंड होंगे।
जो धर्मग्रंथों के अध्यादेशों को त्याग देता है, सनकी रूप से कार्य करता है अर्थात मनमाने तरीके से पूजा करता है, न तो खुशी प्राप्त करता है, न उसका कोई कार्य पूरा होता है, और न ही उसे सर्वोच्च मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिए अर्जुन, शास्त्र केवल धार्मिक नियमों के लिए एक साक्ष्य हैं, जिन्होंने किया जाना चाहिए और जो भक्ति के मार्ग में नहीं किया गया।) किसी को भक्ति के मार्ग को स्वीकार नहीं करना चाहिए, जो कि किसी अन्य विशेष प्रकार के व्यक्ति या संत-ऋषि द्वारा निर्देशित शास्त्रों के विरुद्ध है।
वर्तमान में मानव समाजबद्ध है, वह निश्चित ध्यान दे और शास्त्रा विधि अनुसार साधना करके पूर्ण परमात्मा के सनातन परमधाम (शाश्वतम् स्थानम्) अर्थात् सतलोक को प्राप्त करे जिससे पूर्ण मोक्ष और परम शान्ति प्राप्त होती है (गीता अध्याय 15 श्लोक 4 और अध्याय 18) श्लोक 62 में जिसको प्राप्त करने के लिए कहा गया है।) इसके लिए तत्वमित संत की तलाश करें।
(गीता अध्याय ४ श्लोक ३४)
वर्तमान में विश्व में केवल संत रामपालजी ही पुष्पक संत (अधिकारी) हैं, उनका नाम दीक्षा के साथ अपना जीवन सफल बनाये हैं
उनके द्वारा लिखित पवित्र पुस्तकों को आप जरूर पढ़े, इन पुस्तकों को मुक्त मंगाने के लिए कॉमेंट मे अपना नाम, पता और कॉन्टेक्ट न. जरूर लिखे ताकि हम पुस्तकों को आप तक पहुंचाये आपसे कोई पेशा नहीं लिया जाएगा बिलकुल मुफ्त पुस्तक मंगाये |


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