बकरा ईद की जानकारी

  • बकरा ईद की जानकारी

बकरीद को ईद-उल-अज़हा और ईद-उल-जुहा भी कहा जाता है। मीठी ईद के बाद बकरीद इस्लाम धर्म का मुख्य त्योहार माना जाता है। इस त्योहार को मुख्य रूप से कुर्बानी के त्योहार के रूप में मनाया जाता है।

बकरीद
बकरा ईद

क्या ईद के दिन मासूमों के क़त्ल से कोई जन्नत जा सका है आज तक?

जोर करि जबह करै, मुखसों कहै हलाल।
साहब लेखा माँगसी, तब होसी कौन हवाल।।

ईद-उल-अजहा यानी खुदा के लिए दी जाने वाली कुर्बानी वाली ईद जिसे बकरीद भी कहते हैं।  एक तरफ लाखों की संख्या में बकरों की बलि चढ़ाई जाएगी और इसी मौके पर लोग एकदूसरे को ईद की मुबारकबाद देंगे। ये कैसा जश्न है जहां एक तरफ खूनी नदी तो दूसरी तरफ बकरे के मांस के पकने की सड़न। चाहे इंसान जला लो या बकरा पका लो दोनों के पकने और जलने पर एक जैसी बदबू उठती है। कुर्बानी के बकरे के गोश्त को तीन हिस्सों में बांटा जाता है। गोश्त का एक हिस्सा गरीबों में तकसीम किया जाता है, दूसरा दोस्त, अहबाब के लिए और वहीं तीसरा हिस्सा घर के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यानी जीव हत्या के पाप में गरीब, अमीर, परिवार और दोस्तों की भी बराबर की हिस्सेदारी होती है।
कबीर-यह कूकर को भक्ष है, मनुष देह क्यों खाय। मुखमें आमिख मेलिके, नरक परेंगे जाय।

जब किसी के जनाजे़ से हम घर को लौट कर आते हैं तो सबसे पहले स्नान करने जाते हैं। क्यों? क्योंकि शायद मुर्दा के शरीर के आसपास जीवाणु होते होंगे। फिर जानवर को मारकर क्यों खाते हैं ?
टट्टी और पेशाब करके आते हैं तो सबसे पहले हाथ धोते हैं कि कहीं जीवाणु हाथ में चिपके न रह जाएं।
सभी मानव और जानवर के शरीर के भीतर खून, मल, पैशाब, थूक, बलगम भरा होता है। इन सभी चीजों के शरीर से बाहर आने और इन्हें देखने पर भी घिन्न होती है। जब मांस खाने वाले किसी कसाई की दुकान पर गोश्त खरीदने जाते हैं तो सामने कट रहे जानवर के शरीर में से खून की धारा बह चलती है। काटने वाला तो कसाई कहलाता है और खाने वाला मांसाहारी।
आतंकवादी वह व्यक्ति होते हैं जिनके दिलों में दूसरी कौम के लोगों के लिए दया खत्म हो चुकी होती है और यदि थोड़ी बहुत रह भी जाती है तो वह स्वयं के शरीर को बंब से उड़ाकर खत्म कर देते हैं। क्या आतंकवादी को बहिश्त (स्वर्ग) में स्थान मिलेगा। कदापि नहीं। तो कसाई और मांसाहारी को भी स्वर्ग में स्थान कभी नहीं नसीब होगा।

अल्लाह कबीर जी फरमाते हैं,जीव हनै हिंसा करै, प्रगट पाप सिर होय।निगम पुनि ऐसे पाप तें, भिस्त गया नहिं कोय।


अक्सर देखा गया है मुस्लिम परिवारों में बकरे और बकरी पाले जाते हैं परंतु ईद अल अदा आने पर वह उसी बकरे को खुदा, अल्लाह के लिए अपना फ़र्ज़ मानते हुए बलि दे डालते हैं। मेरी नज़र में एक कसाई, आतंकवादी और बलि चढ़ाने वाले मुसलमान में कोई फर्क नहीं है क्योंकि दोनों के ही दिल में दया का दरिया नहीं। हर साल ईद पर बकरों के खून से होली खेली जाती है। मनुष्य भी मां के गर्भ से जन्म लेता है और जानवर भी। सभी जानते हैं पूरी सृष्टि परमात्मा, अल्लाह की बनाई हुई है। अल्लाह की बनाई सृष्टि में फिर जानवर के साथ ये बदसलूकी क्यों? कुरान शरीफ़ को गौर से पढ़ने पर कहीं भी जानवर की बलि चढ़ाने का फरमान उस रहमान अल्लाह ताला का नहीं लिखा है। मुस्लिम भाई आस लगाए बैठे हैं कि अल्लाह को जानवर की बलि देंगे और फिर बहिश्त जाएंगे। ऐसा तो सपने में भी मुमकिन नहीं लगता।

मोहम्मद साहब ने कभी मांस नहीं खाया 


मारी गऊ शब्द के तीरं, ऐसे थे मोहम्मद पीरं।।
शब्दै फिर जिवाई, हंसा राख्या माँस नहीं भाख्या, एैसे पीर मुहम्मद भाई।

नबी मोहम्मद जो मुस्लिम धर्म में आखिरी पैगंबर हुए हैं, आदरणीय हैं, जो प्रभु के अवतार कहलाए हैं। कसम है एक लाख अस्सी हजार को जो उनके अनुयाई थे उन्होंने कभी बकरे, मुर्गे तथा गाय आदि पर करद नहीं चलाया अर्थात् जीव हिंसा नहीं की तथा माँस भक्षण नहीं किया। वे हजरत मोहम्मद, हजरत मूसा, हरजत ईसा आदि पैगम्बर (संदेशवाहक) तो पवित्र व्यक्ति थे तथा ब्रह्म (ज्योति निरंजन/काल) के कृपा पात्र थे।
हजरत मुहम्मद जी जिस साधना को करते थे वही साधना अन्य मुसलमान समाज भी कर रहा है। वर्तमान में सर्व मुसलमान श्रद्धालु माँस भी खा रहे हैं। परन्तु नबी मुहम्मद जी ने कभी माँस नहीं खाया तथा न ही उनके सीधे अनुयायियों (एक लाख अस्सी हजार) ने माँस खाया। केवल रोजा व बंग तथा नमाज किया करते थे। गाय आदि को बिस्मिल (हत्या) नहीं करते थे।

एक समय नबी मुहम्मद ने एक गाय को शब्द (वचन सिद्धि) से मार कर सर्व के सामने जीवित कर दिया था। उन्होंने गाय का माँस नहीं खाया। अब मुसलमान समाज वास्तविकता से परिचित नहीं है। जिस दिन गाय जीवित की थी उस दिन की याद बनाए रखने के लिए गऊ मार देते हो। आप जीवित नहीं कर सकते तो मारने के भी अधिकारी नहीं हो। आप माँस को प्रसाद रूप जान कर खाते तथा खिलाते हो। आप स्वयं भी पाप के भागी बनते हो तथा अनुयायियों को भी गुमराह कर रहे हो। आप दोजख (नरक) के पात्र बन रहे हो।

बात करते हैं पुण्य की, करते हैं घोर अधर्म। 
दोनों नरक में पड़हीं, कुछ तो करो शर्म।
फ़रिश्ते ने अकेले इब्राहिम की परिक्षा ली थी न कि इब्राहिम को मानने वाले सभी मुस्लिमों की। फ़रिश्ते ने जानवर की बलि का आदेश सभी मनुष्यों को प्रति वर्ष करने का ऐलान भी नहीं किया था। विचार कीजिए परीक्षा इब्राहिम की हुई और प्रत्येक साल अंधे गधों की तरह लाखों करोड़ों की संख्या में जीव हत्या की जा रही है। अल्लाह के दरबार में हर कर्म का लेखा-जोखा होता है फिर जीव हत्या तो ऐसा कसाई कर्म है जिसका बदला तो अपनी गर्दन कटवा कर देते रहना पड़ता है।

मुस्लिम हज के अंतिम दिन रमीजमारात जाकर शैतान को पत्थर मारते हैं जिसने इब्राहिम को खुदा के आदेश से भटकाने की कोशिश की थी। तो आपको नहीं लगता कि आज के काज़ी, पीर, मौलवी किसी शैतान से कम नहीं है जिन्हें न बाखबर के धरती पर होने का पता है न अल्लाह करीम का सही ज्ञान इनके पास है।

अल्लाह खुश केसे होता है और वर्तमान में विश्व में कोन बाखबर है? 

सबसे बडे़ खुदा अल्लाह को खुश करने की विधि, वास्तविक ज्ञान और भक्ति विधि को न तो हिन्दू संत, गुरुजन जानते हैं तथा न ही मुसलमान पीर, काज़ी तथा मुल्ला ही परिचित हैं। उस सर्व शक्तिमान परमेश्वर की पूजा विधि तथा पूर्ण ज्ञान को केवल बाख़बर संत रामपाल जी महाराज अल्लाह कबीर जी के भेजे हुए बाखबर जानते हैं। बाख़बर संत रामपाल जी महाराज की पनाह में आओ और बलि जैसे दैत्य कर्म से सदा के लिए मुक्ति पाकर बहिश्त (स्वर्ग) से भी ऊपर जाने का मार्ग जानो।

अधिक जानकारी के लिए पढ़े पवित्र पुस्तकें :-

  • ज्ञान गंगा
  • जीने की राह 
  • अंध श्रद्धा भक्ति खतरा ये जान 
  • भक्ति से भगवान तक 
  • गीता तेरा ज्ञान अमृत
www.jagatgururampalji.org


Popular posts from this blog

जीने की राह

भगवान कौन हैं, कैसा है, कहां रहते हैं, किसने देखा है? जानिये |

मानव के उत्थान!